विशालपुर में धूमधाम से मनाया गया छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व हरेली तिहार, पढ़े पूरी खबर,,,,,,,

कृषि औजारों की पूजा कर किसानों ने प्रकृति और पशुधन के प्रति जताया आभार, गेड़ी और पारंपरिक पकवान रहे आकर्षण का केंद्र
विशालपुर सारंगढ़ नईदुनिया दिलीप टंडन
सारंगढ़। जिला मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर वार्ड क्रमांक 5 विशालपुर में छत्तीसगढ़ का पहला लोकपर्व हरेली तिहार हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। श्रावण मास की अमावस्या के अवसर पर मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर ग्रामीणों और किसानों में खासा उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही घरों और मोहल्लों में पर्व की तैयारियां शुरू हो गई थीं। किसानों ने कृषि कार्य में उपयोग होने वाले हल, नांगर, कुदाली, फावड़ा सहित अन्य औजारों को धोकर साफ किया और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना की।

हरेली पर्व किसानों के जीवन और छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। धान की बुवाई और रोपाई का प्रमुख कार्य पूरा होने तथा बैलों से नांगर-ब्यासी का काम संपन्न होने के बाद किसान अपने कृषि उपकरणों को विश्राम देते हैं। इसी परंपरा के तहत हरेली के दिन कृषि औजारों को घर लाकर उनकी साफ-सफाई कर पूजा की जाती है। मान्यता है कि कृषि उपकरण और पशुधन किसान के जीवन और उसकी आजीविका का आधार हैं, इसलिए हरेली के अवसर पर इनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
पशुधन की पूजा और स्वास्थ्य की कामना
हरेली के अवसर पर पशुधन को भी विशेष महत्व दिया गया। किसानों ने गाय-बैलों को नहलाकर साफ किया और उनके सींगों पर तेल लगाया। पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए पारंपरिक रूप से औषधीय जड़ी-बूटियां एवं पौष्टिक आहार देने की परंपरा भी निभाई गई। ग्रामीण जीवन में बैल खेती के प्रमुख साथी रहे हैं, इसलिए हरेली पर्व पशुधन के प्रति किसानों की आत्मीयता और सम्मान को भी दर्शाता है।
ठाकुर देव सहित देवी-देवताओं की पूजा

पर्व के अवसर पर घर-परिवार के साथ ग्राम देवता ठाकुर देव तथा अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा-अर्चना की गई। ग्रामीणों ने अपने गांव और परिवार की सुख-शांति, अच्छी बारिश तथा भरपूर फसल की कामना की। हरेली केवल कृषि उपकरणों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, धरती, वर्षा, पशुधन और खेती-किसानी के प्रति आभार व्यक्त करने की छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा है।
गेड़ी बनी बच्चों और युवाओं के आकर्षण का केंद्र

हरेली पर्व की पहचान रही पारंपरिक गेड़ी भी इस अवसर पर लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। बच्चों और युवाओं ने गेड़ी पर चढ़कर पारंपरिक खेल का आनंद लिया। पहले गांवों में कच्चे और कीचड़ भरे रास्तों के बीच गेड़ी चलाना ग्रामीण जीवन का हिस्सा था। समय के साथ गांव और शहर पक्की सड़कों से जुड़ गए हैं, लेकिन गेड़ी की परंपरा आज भी हरेली के अवसर पर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और बचपन की यादों को जीवंत करती है।
गुड़ के चीले का लगाया भोग
हरेली पर्व पर घरों में विशेष पकवान के रूप में गुड़ का चीला बनाया गया। परिवारों ने देवी-देवताओं को इसका भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में वितरण किया। पर्व के दौरान पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू से घर-आंगन महक उठे। लोगों ने एक-दूसरे को हरेली तिहार की शुभकामनाएं दीं और मिल-जुलकर पर्व की खुशियां साझा कीं।
हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। आधुनिकता के दौर में खेती के तौर-तरीके और ग्रामीण जीवन भले ही बदल रहे हों, लेकिन हरेली पर्व आज भी किसानों को अपनी मिट्टी, प्रकृति, पशुधन और लोक परंपराओं से जोड़ने का काम कर रहा है। विशालपुर में भी लोगों ने पारंपरिक उत्साह के साथ पर्व मनाकर छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखा।




