100 साल पुरानी आस्था का केंद्र है सहंसपुर की चंडी डबड़ी, सपने में मिले माता के दर्शन से शुरू हुई पूजा की परंपरा, पढ़े पूरी खबर,,,,,,,

नीम के पेड़ के नीचे मिले पत्थर को ग्रामीणों ने माना मां चंडी का स्वरूप, किसान की आस्था से शुरू हुई पूजा आज भव्य मंदिर और नवरात्रि ज्योत तक पहुंची
विशालपुर सारंगढ़ नई दुनिया दिलीप टंडन 🖊️🖊️🖊️🖊️🖊️
सारंगढ़ | आस्था और विश्वास की कहानियां अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं। कुछ ऐसी ही रहस्यमयी और श्रद्धा से जुड़ी कहानी सारंगढ़ नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड क्रमांक 6 से लगभग एक किलोमीटर दूर सहंसपुर के बिचखार में स्थित चंडी डबड़ी की है। यहां मां चंडी के प्रति लोगों की अटूट आस्था का केंद्र एक ऐसा स्थान है, जिसकी कहानी करीब 100 साल से भी अधिक पुरानी बताई जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, कभी यहां नीम के पेड़ के नीचे एक छोटे से पत्थर को माता के स्वरूप के रूप में देखा गया था। समय के साथ इस स्थान पर पूजा-पाठ की परंपरा शुरू हुई और आज यहां भव्य मंदिर में मां चंडी की आराधना की जा रही है। विशेष रूप से नवरात्रि के नौ दिनों तक ज्योत प्रज्वलित कर समस्त ग्रामवासी माता की पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार, गांव तथा क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

नीम के पेड़ के नीचे मिला था माता का स्वरूप
ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार, चंडी डबड़ी की कहानी इतनी पुरानी है कि वर्तमान पीढ़ी के लोग भी इसके बारे में अपने दादा-परदादाओं से सुनी बातें ही बताते हैं। बताया जाता है कि सहंसपुर के बिचखार क्षेत्र में खेतों के बीच एक नीम का पुराना पेड़ था। उसी पेड़ के नीचे एक छोटा-सा पत्थर था, जिसका आकार मूर्ति जैसा दिखाई देता था। आसपास के क्षेत्र में कई किसानों की जमीन थी और लोग खेती-किसानी के सिलसिले में इसी रास्ते से आते-जाते थे।

इसी क्षेत्र में करिया साव नामक किसान की जमीन भी थी। ग्रामीणों की मानें तो उस स्थान से जुड़ी माता की आस्था और पूजा की परंपरा आगे बढ़ने में मंगलू देवांगन नामक किसान की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह खेती के सिलसिले में अक्सर इसी रास्ते से गुजरता था। इसी दौरान एक ऐसी घटना हुई, जिसने उसके मन में मां चंडी के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न कर दी।
सपने में माता के दर्शन होने की बताई जाती है कहानी
ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, एक रात मंगलू देवांगन को सपने में माता के दर्शन हुए। मान्यता के अनुसार, सपने में माता ने उससे कहा कि जिस रास्ते से वह रोजाना आता-जाता है, उसी रास्ते पर नीम के पेड़ के नीचे उनका स्थान है। माता ने वहां पूजा-पाठ करने और मंदिर बनवाने की बात कही। साथ ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद भी दिया।
बताया जाता है कि सुबह जागने के बाद मंगलू देवांगन उसी रास्ते से नीम के पेड़ के पास पहुंचा। वहां उसने एक छोटा-सा पत्थर देखा, जिसका स्वरूप मूर्ति जैसा था। ग्रामीणों के अनुसार, इस घटना के बाद उसका विश्वास और मजबूत हो गया कि सपने में उसे माता का संदेश मिला था। इसके बाद उसने उस स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू कर दी।
यहीं से चंडी डबड़ी में माता की आराधना की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। मंगलू देवांगन नियमित रूप से पूजा-पाठ करने लगा और उसकी श्रद्धा धीरे-धीरे आसपास के लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बन गई।
किसान की आस्था से जुड़ी है 22 एकड़ जमीन की लोककथा
चंडी डबड़ी की कहानी में मंगलू देवांगन के जीवन से जुड़ी एक और मान्यता का उल्लेख किया जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, शुरुआत में उसके पास कुछ ही एकड़ जमीन थी। वह माता की पूजा-अर्चना करता रहा और समय के साथ खेती के लिए जमीन खरीदता गया। गांव में प्रचलित लोककथा के अनुसार, माता के आशीर्वाद से उसकी जमीन बढ़ते-बढ़ते करीब 22 एकड़ तक पहुंच गई।
ग्रामीण इस घटना को माता के आशीर्वाद और मंगलू देवांगन की अटूट श्रद्धा से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इस संबंध में स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध होने की जानकारी नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह कहानी आज भी प्रचलित है।
बताया जाता है कि मंगलू देवांगन की इच्छा के बावजूद उसके जीवनकाल में वहां भव्य मंदिर का निर्माण नहीं हो सका। बाद में उसके निधन के बाद भी उस स्थान पर पूजा-पाठ की परंपरा धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही। समय के साथ आसपास के ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ी और चंडी डबड़ी के प्रति लोगों की श्रद्धा मजबूत होती गई।
सपने में मंदिर बनवाने का संदेश मिलने की भी मान्यता
ग्रामीणों के अनुसार, आगे चलकर मन्नू की मां को भी सपने में माता से संबंधित संदेश मिला, जिसमें मंदिर बनवाने की बात कही गई थी। इसके बाद मन्नू ने वहां एक छोटा-सा मंदिर बनवाया और नवरात्रि के नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू की। तभी से नवरात्रि के दौरान माता के स्थान पर ज्योत प्रज्वलित करने और विधि-विधान से पूजा-पाठ करने की परंपरा लगातार आगे बढ़ने की बात ग्रामीण बताते हैं।
छोटे से मंदिर से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे पूरे गांव की आस्था से जुड़ गई। ग्रामीण मिलकर पूजा की व्यवस्था करने लगे और माता के दरबार में अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचने लगे। आज चंडी डबड़ी केवल एक धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि सहंसपुर और आसपास के श्रद्धालुओं की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
चुनाव में जीत के बाद भव्य मंदिर निर्माण की कहानी
चंडी डबड़ी के इतिहास में भव्य मंदिर निर्माण से जुड़ी एक और घटना का उल्लेख ग्रामीण करते हैं। बताया जाता है कि नगर पालिका चुनाव के दौरान रामप्रसाद यादव अपनी पत्नी के साथ शाम के समय माता के दरबार में पहुंचे थे। उन्होंने मां चंडी से प्रार्थना की कि यदि उन्हें चुनाव में विजय प्राप्त होती है, तो वे जीतने के बाद माता का भव्य मंदिर बनवाएंगे।
ग्रामीणों के अनुसार, रामप्रसाद यादव ने इसके बाद चुनाव की तैयारी की और चुनाव में जीत हासिल की। जीत के बाद उन्होंने अपनी प्रार्थना के अनुरूप मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बाद नीम के पेड़ के नीचे मिले छोटे-से पत्थर से जुड़ी आस्था का यह स्थान भव्य मंदिर के रूप में विकसित हुआ।
स्थानीय लोगों के लिए यह घटना भी माता के प्रति विश्वास और श्रद्धा की कहानी का हिस्सा है। ग्रामीण इसे माता के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना और मनोकामना से जोड़कर देखते हैं।
नवरात्रि में नौ दिनों तक प्रज्वलित होती है ज्योत
वर्तमान में चंडी डबड़ी में नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर में ज्योत प्रज्वलित की जाती है और ग्रामीण सामूहिक रूप से पूजा-पाठ में भाग लेते हैं। बैगा, नेहरू देवांगन सहित समस्त ग्रामवासी अपनी-अपनी भूमिका निभाते हुए धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं।
नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु माता के दर्शन कर परिवार की खुशहाली, अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि मां चंडी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता के आशीर्वाद से पूरी होती है। यही वजह है कि पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरे श्रद्धाभाव से निभाया जा रहा है।
रहस्य से शुरू हुई कहानी, आज बनी सामूहिक आस्था की पहचान
सहंसपुर के बिचखार स्थित चंडी डबड़ी की कहानी नीम के पेड़ के नीचे मिले एक छोटे-से पत्थर से शुरू होकर आज भव्य मंदिर तक पहुंच चुकी है। सपने में माता के दर्शन, किसान मंगलू देवांगन की पूजा-अर्चना, मंदिर निर्माण की लोककथा और नवरात्रि में ज्योत प्रज्वलित करने की परंपरा इस स्थान को विशिष्ट पहचान देती है।
भले ही इस कहानी के कई प्रसंग ग्रामीणों की मौखिक परंपरा और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, लेकिन चंडी डबड़ी के प्रति लोगों की श्रद्धा आज भी कायम है। करीब एक सदी से अधिक पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा दर्शाती है कि किस तरह किसी छोटे से स्थान से जुड़ा विश्वास समय के साथ पूरे गांव की सामूहिक आस्था बन सकता हैँ
आज चंडी डबड़ी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि बुजुर्गों से नई पीढ़ी तक पहुंची उस धार्मिक विरासत का प्रतीक है, जिसे ग्रामीण अपनी परंपरा, विश्वास और मां चंडी के प्रति समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।




